नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण
दोस्तों आपका फिर से स्वागत है आपके अपने सत्संग भवन पर जिसका नाम है "भक्त के वशमें है भगवान" दोस्तों आज हम अपने वादे के अनुसार एक और भक्त की कहानी लेकर आपके सामने उपस्तित हुए है तो आओ जानते है इन भक्त को कैसे भगवन मिले
                             
                             राम भक्त मोरोपंत

मोरोपंतके जीवनकालमें महाराष्ट्रके आळन्दी आदि क्षेत्रों में भगवत्प्रेमी संतोंके द्वारा भागवतधर्मका प्रचार हो रहा था। बड़े-बड़े रसिक और भगवद्भक्त उस समय विद्यमान थे। पंतकी रसवती वाणीने हिंदूधर्मके पुनरुत्थानमें महान् योग दिया। महाकवि मोरोपंतका जन्म १६५१ शाकेमें पन्हालगढ़में हुआ था। वे पराड़कर ब्राह्मण थे, उनके मूलपुरुष सोनोपंत थे, मोरोपंतके पिताका नाम रामाजी पंत था। मोरोपंतकी माताका नाम लक्ष्मीबाई था, माता-पिताके आचार-विचार और धार्मिक भावनाका मोरोपंतके चरित्र-विकासपर बड़ा प्रभाव पड़ा था। कुल परम पवित्र था, भगवान्के सगुणरूपका चिन्तन करनेवाले महाभागवतोंने समय-समयपर उसमें जन्म लिया था। मोरोपंतके प्रारम्भिक तेईस-चौबीस साल पन्हालगढ़में ही व्यतीत हुए। उसके बाद वे सपरिवार बारामती चले आये। उनका बाल्यावस्थासे ही रामभक्ति और काव्यज्ञानमें अनुराग था। शास्त्र, साहित्य और काव्य-ग्रन्थोंकी प्रतिलिपि करनेमें उनकी विशेष अभिरुचि थी; जिस किसी भी ग्रन्थमें भगवान्की लीला-कथा मिल जाती, उसे वे अपना प्राणधन समझते थे। उनका गृहस्थ-जीवन परम सुखमय और सरस था। मोरोपंतकी स्त्री रमाबाई अत्यन्त सती-साध्वी, सुशीला और सद्गुण-सम्पन्ना थीं। | मोरोपंतका स्वभाव प्रेममय, कोमल और मधुर था। मोरोपंतका परिवार बहुत बड़ा था, उनके-ऐसे प्रेमी, सात्त्विक वृत्ति-सम्पन्न पुरुष ही उतने बड़े कुटुम्बका भरण-पोषण कर सकते थे। उन्होंने एक बार काशीयात्रा की थी; काशीके पण्डितोंने उनकी कविता और भगवद्भक्तिको मान्यता दी, उनकी लोकप्रियता बढ़ गयी। | मोरोपंतका काव्य-जीवन परम सरल था, उसमें भक्तिका सरस विलास था। उन्होंने अखण्डरूपसे ईश्वर-उपासना की, भगवत्-महिमासे अपने काव्य-साहित्यकी श्री-वृद्धि की। पंत पहले भगवद्भक्त और बादमें कवि स्वीकार किये जाते हैं, भगवद्भक्त कवि ही भगवान्की महिमाका विस्तार करते हैं। रामायण, महाभारत और भागवतरूप कल्पलताओंकी छायामें मोरोपंतने आजीवन विश्राम किया। वे सरस बादलकी तरह इन महासागरोंसे अमृत खींचकर काव्यरसिकोंको जीवन-दान किया करते थे। इन तीन ग्रन्थों पर उन्होंने अपनी काव्य-सम्पत्ति निछावर कर दी । मोरोपंतने भगवान् और उनके भक्तोंका चरित्र गाया। मराठीमें उन्होंने लाखों पदोंकी रचना की, रामसाहित्यका सागर उँडेल दिया। जनताको सीधी-सादी भाषामें भगवत्सेवाका मर्म | बताया। वे भगवद्भक्त और कर्मनिष्ठ समानरूपसे थे। वे | सगुणोपासक और अद्वैतवादी दोनों थे। विनयके तो मर्तरूप
थे। स्वयं संत थे, पर संतों और भगवद्भक्तोंकी चरणधूलिमें उनकी अनुपम निष्ठा थी; कवीश्वर थे, पर अपनेआपको कवियोंका सेवक मानते थे। महाबुद्धिमान् थे, पर अपने-आपको मतिमन्द कहनेमें ही गौरवकी अनुभूति करते थे। बड़े पुण्यशाली थे, पर अपने-आपको सदा अति लघु समझते थे। वे परमार्थके बहुत बड़े साधक थे; हरिभक्ति-रसायनसे उन्होंने अपना ही नहीं, अनेक जीवोंका भवरोग समाप्त कर दिया। | मोरोपंतका जीवन अलौकिक घटनाओं और चमत्कारों से परिपूर्ण था। उनके उपास्य भगवान् श्रीराम थे। पहले वे शालग्रामकी पूजा करते थे। अहमदनगरमें एक रामभक्त महात्मा थे। उनके पास 'राम-पञ्चायतन' मूर्ति थी। भगवान् श्रीरामने उन्हें रातमें स्वप्नमें आदेश दिया कि * मूर्तिकी पूजाके अधिकारी बारामती-निवासी परम भक्त मोरोपंत हैं, उनके पास मूर्ति पहुँचा दी जाय।' वे भगवत्कृपा-प्रसादके कितने बड़े अधिकारी थे! | शाके १७१६ चैतकी रामनवमीको उन्होंने जमकर श्रीरामका जन्मोत्सव किया। एकादशीको उन्हें ज्वर आया, धीरे-धीरे बढ़ने लगा। पंतके प्रेमीजन तथा परिवारके लोग एकत्र हो गये। मङ्गलवार था, चैत्री पूर्णिमाके शुभ अवसरपर मरणासन्न पंतने अत्यन्त हृदयद्रावक काव्य-भाषामें गोमाता, भमाता, तुलसी, गङ्गा-माता और राम-नाम तथा आप्त और भक्तजनोंका स्मरण किया; बस, कुछ ही समयमें उनके प्राण देहसे बाहर हो गये। उनका मरण तत्कालीन मराठी साहित्यके सौभाग्य सूर्यके लिये कलङ्क बनकर आया। जनताकी ओरसे उनके भक्त पाण्डुरंग नाइकने एक विशाल राम मन्दिरका निर्माण उनके शुभ स्मरणके प्रतीकस्वरूप कराया। मोरोपंत अपने समयकी बहुत बड़ी काव्य-शक्ति थे, भक्तिके प्रचारक थे, रामके महान् भक्त थे।
तो देखा दोस्तों भक्त के ऐसे बनते है भगवान तो दोस्तों आप ऐसे ही भगवन के भक्तो की कहानियां देखे हर रविवार को आप हमारे चेनल को फॉलो करें तबतक के लिए राम राम।