गणेशाय नमः

महिमा जासु जाने गनराऊ । प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥

(श्रीरामचरितमानस) बर्वमय सर्वरूप करुणासागर भगवान् जीवोंपर कृपा करके स्वयं ही उनको अपनाते हैं। संसारके नाना प्रकारके रोग-शोक, जन्म-मृत्यु आदि कष्टों में पड़े हुए,

-कोध-लोभ-मोहादि विकारोंसे अन्धे बने जीवोंको सन्मार्गपर लानेके लिये, उनको कल्याणका ठीक-ठीक या बतलानेके लिये एक होकर भी वे दयामय अनेक दिव्य मङ्गलमय रूप धारण किये हुए हैं और अपने उन चिन्मय आनन्दमय रूपोंसे ऐसी लीलाएँ करते हैं, जिनका ध्यान करके, जिनका श्रवण एवं कीर्तन करके संसार-सागरमें डूबते-उतराते प्राणी सरलतासे इससे पार हो जाते हैं। वे परम उदार प्रभु अपनी अहैतुकी कृपासे ऐसी लीलाएँ करते हैं, जो जीवको उसके उद्धारका मार्ग बतलाती हैं। प्राणियोंके उद्धारके लिये ही वे परम प्रकाशक, सबके परमाराध्य स्वयं अपने द्वारा अपनी ही आराधना करते हैं। भक्तिका मङ्गलमय मार्ग अपने आचरणसे वे प्रभु दिखलाते हैं और फिर उस मार्गपर चलनेवालेको स्वयं अपनाते हैं।

भगवान्के मङ्गलमय लीलारूपोंकी गणना करना तो सम्भव ही नहीं है। भगवान्के रूप अनन्त हैं, उनकी लीलाएँ अनन्त हैं और उनके लीलाविलास भी अनन्त हैं। भगवान्के सभी रूप परस्पर अभिन्न-एक तथा सम्पूर्ण दिव्य नित्य शक्तियोंसे युक्त हैं। भगवान्के इन अनन्त नित्य चिन्मय रूपोंमें पाँच रूप हमारे सामाजिक संस्कारोंमें

तास पूजित होते हैं-१. भगवान नारायण, २. भगवान् । व, ३. भगवती महाशक्ति, ४. भगवान् सूर्य, एवं ५.

वान् गणपति । इनमें भी भगवान गणपति सभी आराधनाओं एवं मङ्गल कार्योंमें प्रथम पूज्य माने जाते श्रीगणेशजीके प्रथम पूज्य होनेकी अनेक कथाएं है। वे रुद्रगणोंके अधिपति हैं, अतः उनकी प्रथम पूजा करने से कार्य निर्विघ्न समाप्त होता है।  एक कथा यह भी है जब सृष्टि की रचना हुई उस सृष्टिके प्रारम्भमें देवताओं में प्रथम पूज्य किसे माना जाय, यह प्रश्न उठा तब सब देवता ब्रह्माजीके पास गये। ब्रह्माजीने उन्हें बताया कि जो कोई पूरी पृथ्वीकी प्रदक्षिणा सबसे पहले कर ले, वही प्रथम पूज्य माना जाय। सब देवता अपने-अपने वाहनों पर बैठकर प्रदक्षिणाके लिये चल पड़े। गणेशजीका शरीर स्थूल है, वे लम्बोदर हैं और उनका वाहन है चूहा। देवताओं में अनेकोंके वाहन पक्षी हैं। कुछ रथपर, अश्वपर या हाथीपर विराजते हैं। उन सबके साथ भला गणेशजी कैसे दौड़ सकते थे? देवर्षि नारदजीकी सम्मतिसे गणेशजीने भूमिपर 'राम' यह भगवान्का नाम लिखा और उसीकी सात प्रदक्षिणा करके ब्रह्माजीके पास पहुँच गये। सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने उन्हींको प्रथम पूज्य बताया; क्योंकि 'राम' नाम तो साक्षात् श्रीरामका स्वरूप है और श्रीरामके तो रोमरोममें कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड हैं। श्रीगणेशजीने रामनामकी परिक्रमा करके समस्त ब्रह्माण्डोंकी परिक्रमा कर | ली थी।

एक कथा ऐसी भी है कि श्रीगणेशजीने भगवान् शङ्कर एवं पार्वतीजीकी ही प्रदक्षिणा की; क्योंकि माता साक्षात् क्षितेस्तनुः' अर्थात् माता साक्षात् पृथ्वीरूप एवं पिता प्रजापतिके स्वरूप हैं। कल्पभेदसे दोनों ही कथाएँ सत्य हैं। श्रीगणेशजी तो भगवान्के ही स्वरूप हैं और नित्य हैं। उन्होंने इस प्रकार भगवन्नामकी श्रेष्ठता तथा माता-पिताकी भक्तिका आदर्श स्थापित किया और बताया कि केवल शरीरके बल या दूसरे लौकिक साधनोंसे होनेवाली सफलता झूठी है और उसपर विश्वास करनेवाला कभी भी धोखा खा सकता है। कोई किसी प्रकारकी भी सफलता चाहता हो, उसे भगवान्का ही आश्रय लेना चाहिये। मङ्गलमूर्ति गणेशजीकी प्रथम पजा सभी विघ्नोंको तो दूर करती ही है, भगवान्के चरणों में ही सब ओरसे लगनेका आदर्श भी उसमें है। गणेशजीकी बड़ी विस्तृत कथाएँ हैं। उनका उपनिषद् है, गणेश-गीता है। सभी मनन करने योग्य हैं। हमारे इस पोस्ट को आप सेयर जरूर करे।
तो बोलो भक्तो भगवान गणेश की जय हो।